गज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, नवंबर 18, 2012

तुम नहीं आओगे...

तुम नहीं आओगे- ऐसा लगता है, मैं ही खबर दे दूं, दिल ये कहता है,
भंवरे तो उतनी गूँज करते नहीं, पर अब भी जूही यहाँ महकती है,

गोया भूले से इधर आया हो, या कि उसे खींच कोई लाया हो,
सूरज भी पहले जैसा लगता नहीं, दिखने में आग तो दहकती है.

इक जगह ना चैन से ठहरता है, चन्दा भी आता-जाता रहता है,
टिक गया 'नज़र' जो दो-चार घड़ी, चांदनी फिर जोर से लहकती है.


न कहा कुछ भी मैंने कोयल से, क्या है पगली को एक पागल से,
रात मानो काटी हो- मेरी ही तरह, देखते ही सुबह वो कुहकती है.


जैसे पसरा हुआ सा मातम हो, कोई गुजरा है बस- नया गम हो,
ना तो इठला के छुए फूलों को, अब न भूले- हवा बहकती है.
---

गुरुवार, नवंबर 01, 2012

ना ही बंद हुई खिड़की


नजारा-ए-महफ़िल, तुर्रा वैसी उनकी शिरकत,
न वाह मुंह से निकला, हाय- आह भी न निकली.

गुस्ल-ओ-वजू, नमाज़,  रोज़े भी किये हमने,
न ही खुशबू कम हुई, उनकी चाह भी न निकली.

हम पड़े थे राह में- कि कुछ रिवायतें होती हैं,
ये क्या-  न उठे पाँव, ढंकी बांह भी न निकली!

क्या इसे ही कहते हैं नज़र’- उम्मीद, इंतज़ार,
ना ही बंद हुई खिड़की, कोई राह भी न निकली.
***

हारा, क्या हुआ?


कल साक़ी की आँखों से, इशारा क्या हुआ,
मत पूछिए महफ़िल में- नज़ारा क्या हुआ.

बुलाया किस-किस को साक़ी ने- उज्र क्यों,
आखिर में तो हमें ही पुकारा- क्या हुआ.

न दीवाना था- मै जाँ को हथेली पे ले गया,
सोचो तो- ऐसा इम्तेहां, दुबारा क्या हुआ?

तुम जीत लो जहां, दुनिया भी रख लो तुम,
क्या मिला नज़रको छोड़ो- वो हारा, क्या हुआ!
***

रविवार, अगस्त 12, 2012

इतना मिला जो प्यार तो...


इतना मिला जो प्यार तो, हैरान सी मर जाऊंगी,
आसानियाँ होंगी तो हो मजबूर- ठहर जाऊंगी.

इतना यकीं है तुमसा कोई, ढूँढे से नहीं पा सकते,
अल्ला-कसम मिला कोई, अल्लाह से डर जाऊंगी.

रौशनी नहीं तो क्या, थोड़ी सी देर रूक तो लो,
बिजली सी बनके देखना, तुम में उतर जाऊंगी.

पत्थर हूं, मै चट्टान हूं- जब तक तू मेरा साथिया,
तुमसे बिछड ऐ नज़र’, मै रेत सी- झर जाऊंगी.

बदली है कैसी ये हवा, चलने लगी हैं आंधियां,
पकड़ा न मेरा हाथ जो, बह के किधर जाऊंगी.
---

शनिवार, जुलाई 07, 2012

तमाशा उनका है, तमाश-बीन भी वही!


हालात पे रोना है यूं- तो कीजिये भी क्या,
जानी ना कद्र, तुर्रा ये- शौक़ीन भी वही.

हैरान होके लीजिए न, नाम खुदा का,
जो एक है, सो दूसरा- और तीन भी वही.

सरकार दर्द जानती, सरकार देखती,
पर माजरा अजीब है कि, दीन भी वही.

हट जाइए, सो जाइए, कि भूल जाइए,
जिसकी नज़र में किस्सा- ग़मगीन भी वही.

नुक्ताचीनी किस पे, किस बात पे नज़र
ये तमाशा उनका है, तमाश-बीन भी वही.
----

गुरुवार, मई 10, 2012

ख़म थे जुल्फों में

गोया,  बारिश- ओ- हवाओं का  इक बहाना था,
ख़म थे जुल्फों मे कि, इस दिल को उलझ जाना था.

पड़तीं बारिश की वो बून्दें, उनके गरमाए बदन पे,
जैसे पानी को खुद-  प्यासे पे चले आना था.

क्या पता थी क्या जगह, कैसे कहें कि क्या हुआ,
दोनों हम ख़ुद भी कहाँ थे, ये किसने जाना था.

मिलना वो दो रूहों का- इतना तो आसां न था,
फासले आगे थे और, पीछे ये जमाना था.
***

गुरुवार, अप्रैल 26, 2012

होगी मुश्किल न जो आसान

होगी मुश्किल ना जो आसान, तो फिर क्या होगा,
कल तो था कल की तरह, आज भी धोखा होगा?

अपने हिस्से के गमों को, न कभी बाँट सका मै,
क्या पता कितनों का दिल- उसने यूं रखा होगा.

चोट लगती भी है तो, दर्द न यूं होता है,
उसकी ही रुह हूं मै, इतना तो वो समझा होगा.

फिर से बारिश, ये हवा, और मेरा तल्ख़ जिगर,
वो उधर हाँ, कि नहीं- ना  ही में उलझा होगा.

दुआ में हाथ उठा- फिर से गिरा जाए नज़र’,
उसकी खातिर तो ये, पहला ही ना किस्सा होगा.
***

बुधवार, मार्च 21, 2012

देखा क्या बेकरां होना?


क़रहे देखे हैं, तो देखा क्या- बेकराँ होना,
किसने देखा है उन्हें, अपना भी मेहमाँ होना.

कबसे बैठे हैं सिर झुकाए हुए, मफफिल में,
कोई जा, उनसे कहे- हाल-ए-गरीबाँ होना.(1)

बात सुन कर, वो मुस्कुरा के चले जाते हैं,
याद रखते हैं मगर- थोड़ा सा हैराँ होना.(2)

बाद मुद्दत के मिले भी तो, सिर झुकाए हुए,
इससे बेहतर था वही, चाके-गिरेबाँ होना. (3)

उनके खत लौट के आते हैं हमीं को साहिब,
तुर्रा तो देखिए- ये रोज का किस्सा होना.(4)

आसमाँ आज तलक मुझसे खफा है ऐ नजर’,
उनका वो चाहे-ज़कन ओ मेरा सदक़ा होना.(5)

करहे= घाव/जख्म, बेकरां= गहराई, चाहे-जकन= ठुड्डी का गड्ढा
***

इक जहाँ ऐसा भी हों


इक जहाँ ऐसा भी हो


अपने-अपने वास्ते हो, इक जहां ऐसा भी हो,
दुनिया हो सबकी जुदा, ना वास्ता कैसा भी हो.

जिसको जितना चाहिए, बस धूप उतनी ही मिले,
उतनी ही बारिश चले कि ‘चल बरस’ जितनी कहो.

जिसको दिल अपना कहे, आयद हो उसपे शर्त ये,
जिसका दिल तुम ले चुके हो, अब उसी दिल में रहो.

कुफ्र का न सवाल हो- खुशियों का मसला हो अगर,
सब छूट हो मस्ती की- जैसा जी करे, वैसे रहो.

हद हो कोई गम की भी, और- आह पे बंदिश ‘नज़र’,
मिक़दार अश्कों की भी हो- बस हुआ, अब ना बहो.
***

शीशा चटक गया!


शीशा चटक गया!

बेदाग़ हुस्न देखना-   इतना खटक गया, 
चेहरा तुम्हारा देखके - शीशा  चटक गया.
उड़ते हुए बादल ने जो- निगाह ईधर की, 
जुल्फें तुम्हारी देखने, नीचे लटक गया.
छत पर से तेरा झांकना, कैसा हुआ गज़ब, 
वो इमाम जाते-जाते-  रस्ता भटक गया. 
दिखा रहा था, देखो- आफताब जो चमक, 
परदे में बादलों के- वो अभी सटक गया.
यह झील सी आंखे जो समन्दर ने देख लीं, 
दरिया को बेखुदी में वो-  हौले गटक गया.
भंवरा जो सो रहा था- आगोश में कली की, 
एक फूल देख के ‘नज़र’- फिर से मटक गया.