शुक्रवार, अप्रैल 05, 2013

तालाब का पानी


मैंने देखा भर है,
छुआ नहीं,
शांत और ठहरे हुए,
तालाब के पानी को,
चुप-चाप और खामोश,


करते हुए इन्तजार,
किसी कंकड का,
जो रख दे हिला-डुला कर,
मचा  दे उथल-पुथल,
और बना जाए सार्थक,
होना तालाब का पानी,
जो ठहरा हुआ नहीं.
---

रविवार, मार्च 31, 2013

पी.एच.डी. चोर


चोर-चोर का शोर हुआ तो, जो सोए थे जाग  लिए,
गश्त में चार सिपाही भी थे, चोर के पीछे भाग लिए.
एक सिपाही बहुत सयाना, फेंक के मारा अपना डंडा,
जब  दो टांगों के बीच लगा, गिरा भागता वह मुस्टंडा.
मुंह को देख सिपाही बोला- हो गया मुझको कैसा धोखा,
मास्टरजी! क्यों दौड़ रहे थे?  गलती से ही आप को रोका.
अरे आप तो टीचर शर्मा हैं, समझा था कोइ और,
अभी-अभी उस पतली गली से भागा है एक चोर.
बोला चोर  सिपाही से- सुनो मामला ऐसा है,
तुमसे गलती नहीं हुई है, चोरी मेरा पेशा है.

रात को इसमें  दो घंटे लगते हैं, सारा दिन बेकार हूं,
मास्टर बन कर समय बिताने को दिन में  लाचार हूं.
तीन महीने पहले बिका है, बीवी का गहना आख़िरी,
पी. एच. डी. हूं, उल्लू नहीं, गयी भाड़ में मास्टरी.
---


यह शिक्षकों की वर्तमान दयनीय दशा पर ध्यान दिलाने 
के लिये लिखा गया है, हँसने के लिये नहीं.

शुक्रवार, मार्च 29, 2013

दोनों एक हैं!


दोनों एक हैं,
मैंने देखा है,
खुद अपनी आँखों,
आदमी और औरत को,
दोनों को,
जो झोंकते आये हैं,
धूल सबकी आँखों में,
देखे और पकड़े जाने पर,
खिलखिला कर कहते हैं-
भलाई है सबकी,
इसी झूठ में!.
---

शुक्रवार, मार्च 22, 2013

आज भर!

साफ़-साफ़ देखा था मैंने,
आते ही अंदर कमरे में,
बैठी पास पलंग के ,
लाल-गुलाबी गठरी को,
झट से सरक कर बदल गयी थी,
घूंघट वाली नार में.
लगा था मुझको,
बीस के बदले,
भरी थीं उसने-
तीन ही साँसे.

फिर बढ़ते हाथों को देख,
जैसे कुछ अंदेशा हो,
बोल पड़ी थी-
पी... पी लीजिए दूध,

हैं?
दूध देने आई थी,
छोड़ दीजिए,
हमारी कसम,
...
आज भर!
---

गुरुवार, मार्च 21, 2013

यादें बचपन की.


कभी हँसाएं, कभी रुलाएं, क्या-क्या रंग दिखाएं,
यादें बचपन की, ये यादें बचपन की.

सुबह सवेरे घर से निकलते, घर का रुख ना करते,
जब तक मम्मी ढूंढ ना लेती, कहाँ-कहाँ हम फिरते,
तीखी मीठी डांटे सुनते, मुँह में हँसी दबाए.
...यादें बचपन की.
जब तक पापा घोड़ा बनते, दूध ना तब तक पीते,
गुस्सा आता तो पापा की, मूंछ पकड़ के लटकते,
आती नींद तभी जब पापा, गोद में रख के सुलाएं.
... यादें बचपन की.
चोटी मेरी खींच के भैय्या, खूब मरम्मत करते,
फिर टॉफी दे कान पकड़ते, सौ-सौ नाक रगड़ते,
रानी बन हम खाते वही, जो अपने मन को भाए.
...यादें बचपन की.

साईकल पर जब बस्ता रखकर, हम स्कूल से चलते,
तुम उलझाते साईकल मेरी, सड़क पे दोनों गिरते,
बात न करते तुमसे हफ्तों, रहते नाक फुलाए.
... यादें बचपन की.

बुधवार, मार्च 20, 2013

तू ही बस मेरा न था!


ज़मीं तेरी,  हवा तेरी, शफक तेरी, हया तेरी,
आसमां, सूरज, गुलिस्तां और क्या तेरा न था,
खुदी मेरी, बदी मेरी, कजा मेरी, सजा मेरी,
था इधर भी बहुत लेकिन, तू ही बस, मेरा न था.

धूप तेरी, छाँव तेरी, दरिया तेरी, नाव तेरी,
था तुझे सब कुछ मयस्सर, क्या भला तेरा न था,
जलन मेरी, चुभन मेरी, भंवर मेरा, घुटन मेरी,
थी बड़ी दौलत मेरी, पर- तू ही बस, मेरा न था. 
--- 

शनिवार, मार्च 16, 2013

यही रहते थे आदमी कभी!


अब नहीं होती मौत,
शहर में,
किसी गीदड़ की,
डर नहीं लगता उसे,
आने से,
और भभकियां देने तक से,
उन सब को-
जो शहर में पाए जाते हैं, 
रहते हुए-
किसी से चिपके,
और कहीं दुबके.
कहा और सुना जाता है- 
यहीं रहते थे,
आदमी कभी!
   ---

बुधवार, मार्च 13, 2013

कहाँ और क्यों है गड़बड़ ?



हो जाता है,
कितना अर्थहीन, तुच्छ और अप्रासंगिक,
खाया हुआ,
पिछले तीस सालों का, 
भोजन भरपेट,
या दोस्तों-मित्रों का साथ,
ऊंचे-नीचे, टेढ़े-सीधे रास्तों पर,
और वह हर एक पल, 
जो आया हमारी जिंदगी में,
एक खुशी नयी लेकर?
जब नहीं मिलता,
बस एक दिन,
खाने को,
या होते हैं व्यस्त मित्र, 
कभी अपनी उलझनों में, 
और सुन लेते हैं हम,
कोई बात मुसीबत की,
क्यों? क्यों?? क्यों??? 
कहाँ और क्यों है गड़बड़?
भोजन, मित्रों, खुशियों में,
या हमारा ही ...
ढीला है कोई पेंच? 
    ---

मंगलवार, फ़रवरी 12, 2013

कांटे- गुलाब के साथ


कल कहा मैंने, 
काँटों से,
क्या नहीं सोचते कुछ भी?
उग आते हो बेझिझक, 
और रहते हो, 
बेशर्मी से- 
मखमली-नाजुक-खूबसूरत,
गुलाबों के साथ,
कहाँ वो,
तुम कहाँ?

पहले तन गया,
सुन कर और जरा,
फिर कहा कांटे ने-

अक्सर रोती है कली,
और कहती है मुझसे-

अभी यह हाल है मेरा,
तुम्हारे होते! 
भैया कांटे,
अगर तुम न होते... 
  ---

शुक्रवार, जनवरी 18, 2013

बरसता नहीं पानी!


जब वो नहीं आते थे,
तो पानी बरसता था.
इक आग सी लगती थी,
बरसता क्यों है पानी!
आज वो आए हैं,
इक आग सी लगी है,
अब आग भी लगती है,
तो बरसता नहीं पानी!
      ---

रविवार, जनवरी 13, 2013

लौट कर


पीता-पीता पानी,
पढ़ते-पढ़ते अखबार,
और उतरता हुआ सीढियां,
मै गया था चला,
उन्हें समझाने, 
और बताने. 
लौटकर,
कोशिश में लगा हूँ-
उतरने की अखबार से, 
पढ़ने की पानी को, 
और पीने की,
सीढ़ियों को.
---

गुरुवार, दिसंबर 27, 2012

वो दिन गए दिलवाली थी ये


वो दिन गए दिलवाली थी ये, अब ये बड़ा एन. सी. आर. देखो.  
दो दिन की जिन्दगी है बाबू मेरे,  तमाशे यहाँ के तो चार देखो.

जगमग है मीना-बाजार देखो, दिल्ली का क़ुतुब मीनार देखो.
बड़ी-बड़ी चीज़ों का नज़ारा करो, चढ़ कर के सारा संसार देखो.

कॅामन-वेल्थ और भागीदारी भी है- कपड़े-लत्ते तार-तार देखो,
फ्लाई-ओवर सुविधा की खातिर बने, सड़कों से उठती पुकार देखो.

पढ़ने की फीस बहुत भारी यहाँ-  इज्जत की जूतम-पैजार देखो,
धौला-कुआं वाला पकड़ा गया, तो- मेरठ का ताज़ा शिकार देखो.

गुनाहों पर पुलिस बहुत सख्त है, टी.वी. में बूटों की मार देखो,
शर्म कितनी कितनी ज्यादा है दैया मेरी- ठंढे पानी की बौछार देखो.

दिल्ली की ऐसी सरकार देखो, विज्ञापन भरे हैं- अखबार देखो,
कूड़े के ढेर पर तो सोते हैं वे- कहते हैं यू. पी. बिहार देखो.

मैडमों का राज है, ऐ मुनिया मेरी, बातें न करना बेकार देखो,
नारे थे वोट के लिए ही मेरी जान, दुश्मन है नारी की- नार देखो.
दिल्ली का क़ुतुब मीनार देखो...
---

बुधवार, दिसंबर 19, 2012

बस और माया कैलेंडर

दिन भर टी. वी. देखा था-
गाँव से आये चाचाजी ने,
और बड़बड़ाए थे, 
पूरी रात-
बचा लो... 
कोई है?
हे धरती माता..
पूछे जा रहे हैं आज, 
सुबह से ही,
बचवा- बताओ,
या पता करो,
बस कहाँ और कब बनी थी.
माया कैलेंडर बनाने वालों ...
         ---

डिजिटल इतिहास

वे बनाए जा रहे हैं,
इतिहास, 
जिसे लिखा जाएगा,
डिजिटल-
बदले जा सकते हैं,
जिनके फॉण्ट, 
और आकार,
अपनी सुविधानुसार,
परन्तु,
नियमानुसार, 
नहीं बदली जायेंगी-
संख्या, स्थान और तिथियाँ,
हां, बदल सकते हैं अभी ...
लिखने से पहले,
डिजिटल इतिहास.
माफ कीजियेगा ...
जस्ट होल्ड ऑन प्लीज...
कोई ब्रेकिंग न्यूज है टी वी पर.
        ---

मरा हुआ आदमी!

थका हुआ आदमी-
उतना थका नहीं होता,
जितना एक मरा हुआ आदमी,
होता है मरा हुआ,
थामे हाथों में,
कैमरे फ्लैश वाले, 
और कलम पारकर की,
चिल्लाता बैठ कर,
समूह और जत्थों में,
पटकता माथा, 
मातम मनाता,
अपनी मौत का!
---

शुक्रवार, नवंबर 23, 2012

छूटता ही नहीं रूठना


छूटता ही नहीं,
अपना रूठना,
बात-बात पर,
गो छोड़ चुके हैं मनाना,
बहुत पहले से,
सभी दोस्त,
इकलौता बेटा,
और आधी जिंदगी.
मै रूठा बैठा,
सोच रहा हूँ,
सबने आखिर,
क्या सोचा होगा!
     ---

रविवार, नवंबर 18, 2012

तुम नहीं आओगे...

तुम नहीं आओगे- ऐसा लगता है, मैं ही खबर दे दूं, दिल ये कहता है,
भंवरे तो उतनी गूँज करते नहीं, पर अब भी जूही यहाँ महकती है,

गोया भूले से इधर आया हो, या कि उसे खींच कोई लाया हो,
सूरज भी पहले जैसा लगता नहीं, दिखने में आग तो दहकती है.

इक जगह ना चैन से ठहरता है, चन्दा भी आता-जाता रहता है,
टिक गया 'नज़र' जो दो-चार घड़ी, चांदनी फिर जोर से लहकती है.


न कहा कुछ भी मैंने कोयल से, क्या है पगली को एक पागल से,
रात मानो काटी हो- मेरी ही तरह, देखते ही सुबह वो कुहकती है.


जैसे पसरा हुआ सा मातम हो, कोई गुजरा है बस- नया गम हो,
ना तो इठला के छुए फूलों को, अब न भूले- हवा बहकती है.
---

शुक्रवार, नवंबर 16, 2012

एक राजा था!

एक राजा था,
ठीक से कहें तो-
एक रानी थी.

प्रजा कैसी थी,
इसका पता चलते ही,
लिख दी जायेगी,
एक कहानी.


हाँ,
जितना ज्यादा लंबा लगा वक्त,
उतनी छोटी होगी,
यह कहानी.

गुरुवार, नवंबर 01, 2012

ना ही बंद हुई खिड़की


नजारा-ए-महफ़िल, तुर्रा वैसी उनकी शिरकत,
न वाह मुंह से निकला, हाय- आह भी न निकली.

गुस्ल-ओ-वजू, नमाज़,  रोज़े भी किये हमने,
न ही खुशबू कम हुई, उनकी चाह भी न निकली.

हम पड़े थे राह में- कि कुछ रिवायतें होती हैं,
ये क्या-  न उठे पाँव, ढंकी बांह भी न निकली!

क्या इसे ही कहते हैं ‘नज़र’- उम्मीद, इंतज़ार,
ना ही बंद हुई खिड़की, कोई राह भी न निकली.
***

पियू घर जाणा


कुछ ना सुहाए मोको, कुछ नईं भाणा,
माई री माई मोको, पियू घर जाणा.

एक तले पे, सौ फुलवारी, 
दूजे पर है, सेज हमारी,
तीजे पे चढ़ि मै सब सुख पाणा. माई...

चौथे तले पियू साज बजाए, 
जितना भी नाचूं, मन ना अघाए,
कौन सुनाए
, मधुर अस गाणा. माई...

पंच पे छप्पन भोग बनाऊं
, 
पियू मॉगे, पर जी ललचाऊं,
छठवें चढ़ि के पियू को जिमाणा. माई...

सात तले पर
, आखिर बाजी, 
जो पियू भाए, सो मन राजी,
चाहूं पिया मोहे समझे न माणा. माई...
***

हारा, क्या हुआ?


कल साक़ी की आँखों से, इशारा क्या हुआ,
मत पूछिए महफ़िल में- नज़ारा क्या हुआ.

बुलाया किस-किस को साक़ी ने- उज्र क्यों,
आखिर में तो हमें ही पुकारा- क्या हुआ.

न दीवाना था- मै जाँ को हथेली पे ले गया,
सोचो तो- ऐसा इम्तेहां, दुबारा क्या हुआ?

तुम जीत लो जहां, दुनिया भी रख लो तुम,
क्या मिला ‘नज़र’ को छोड़ो- वो हारा, क्या हुआ!
***