बुधवार, मार्च 21, 2012

देखा क्या बेकरां होना?


क़रहे देखे हैं, तो देखा क्या- बेकराँ होना,
किसने देखा है उन्हें, अपना भी मेहमाँ होना.

कबसे बैठे हैं सिर झुकाए हुए, मफफिल में,
कोई जा, उनसे कहे- हाल-ए-गरीबाँ होना.(1)

बात सुन कर, वो मुस्कुरा के चले जाते हैं,
याद रखते हैं मगर- थोड़ा सा हैराँ होना.(2)

बाद मुद्दत के मिले भी तो, सिर झुकाए हुए,
इससे बेहतर था वही, चाके-गिरेबाँ होना. (3)

उनके खत लौट के आते हैं हमीं को साहिब,
तुर्रा तो देखिए- ये रोज का किस्सा होना.(4)

आसमाँ आज तलक मुझसे खफा है ऐ नजर’,
उनका वो चाहे-ज़कन ओ मेरा सदक़ा होना.(5)

करहे= घाव/जख्म, बेकरां= गहराई, चाहे-जकन= ठुड्डी का गड्ढा
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