रविवार, मार्च 31, 2013

पी.एच.डी. चोर


चोर-चोर का शोर हुआ तो, जो सोए थे जाग  लिए,
गश्त में चार सिपाही भी थे, चोर के पीछे भाग लिए.
एक सिपाही बहुत सयाना, फेंक के मारा अपना डंडा,
जब  दो टांगों के बीच लगा, गिरा भागता वह मुस्टंडा.
मुंह को देख सिपाही बोला- हो गया मुझको कैसा धोखा,
मास्टरजी! क्यों दौड़ रहे थे?  गलती से ही आप को रोका.
अरे आप तो टीचर शर्मा हैं, समझा था कोइ और,
अभी-अभी उस पतली गली से भागा है एक चोर.
बोला चोर  सिपाही से- सुनो मामला ऐसा है,
तुमसे गलती नहीं हुई है, चोरी मेरा पेशा है.

रात को इसमें  दो घंटे लगते हैं, सारा दिन बेकार हूं,
मास्टर बन कर समय बिताने को दिन में  लाचार हूं.
तीन महीने पहले बिका है, बीवी का गहना आख़िरी,
पी. एच. डी. हूं, उल्लू नहीं, गयी भाड़ में मास्टरी.
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यह शिक्षकों की वर्तमान दयनीय दशा पर ध्यान दिलाने 
के लिये लिखा गया है, हँसने के लिये नहीं.