रविवार, जुलाई 15, 2012

नीम, आम और पीपल

एक नया अरमान लिए,
जाता था हर रोज,
(कभी-कभी दो-तीन बार भी),
उससे मिलने,
(कभी-कभी नहीं मिलती थी),
बहुत तेज चाल में भी,
दिख ही जाते थे,
तीन पेड़-
नीम, आम और पीपल के,
कई मौसम बदले,
देखता गया था मै,
बौर से लेकर आम तक,
नहीं लगे-टंगे कभी-
नीम या पीपल पर,
लेकिन हां,
जाता था जिससे मिलने मै-
वह अब यहीं है,
बैठी हुई खिड़की के पास,
उधेड़ रही है-
वही स्वेटर,
जो मिलने के उन दिनों,
मै अक्सर पहनता था.
वैसे-
कुछ कह नहीं सकता,
नीम और पीपल,
बौर या आम के बारे में.
...
(पिताजी की डायरी से उतारी है, मैंने नहीं लिखी).
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